राजकोषीय घाटा अर्थव्यवस्था के लिए क्यों जरुरी होता है ?

नई दिल्ली (AK Singh)।  हम बजट और उसके बाद रेटिंग एजेंसी के रिपोर्ट से सुनते और देखते है ‘राजकोषीय घाटा’। उस  समय तो हम बजट देख कर काम चला लेते है, लेकिन मन में रहता है आखिर ये राजकोषीय घाटा (fiscal deficit) है क्या ?

आज हम आप बहुत ही सरल भाषा में बताएँगे राजकोषीय घाटा क्या होता है।  

“सरकार के कुछ खर्च और कमाई के बीच के अंतर को राजकोषीय घाटा कहते है।”  दूसरी भाषा में कहे तो राजकोषीय घाटा (fiscal deficit) यानी किसी एक वित्त वर्ष में राजस्व प्राप्तियों तथा अनुदान प्राप्तियों के ऊपर कुल सार्वजनिक व्यय का अन्तर.

कई बार होता है सरकार  अपनी उपलब्धिया गिनाते हुए कहती है हमारे समय में तो राजकोषीय घाटा कम रहा।  यानि की सरकार अपने वित्तमंत्री की तारीफ़ करना चाहती। क्यों की उसी सरकार के मंत्री में राजकोषीय घाटा कम रखा।

राजकोषीय घाटे का के और मतलब है कि सरकार को अपने खर्च यानी व्यय को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से कर्ज लेना पड़ेगा. बढता राजकोषीय घाटा किसी भी देश की पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है. इससे ब्याज दरों में बढोतरी हो सकती है और महंगाई यानी मुद्रास्फीति दर भी बढ सकती है.

इसके कई अन्य गंभीर ‘साइड इफेक्ट’ भी हैं. इसलिए सरकारें कभी नहीं चाहती कि उनका राजकोषीय घाटा बढ़े या उंचा हो.

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