छत्तीसगढ़ में नए गेम प्लान के साथ नक्सल फ्रंट में उतरेगी कांग्रेसी सरकार

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार के सत्ता में आने के बाद एक नई बहस छिड़ गई है. नक्सलवाद के खात्मे को लेकर सरकार का मानना है कि वो पीड़ितों से बात करेगी. उसका यह भी मानना है कि दोनों ओर से अर्थात नक्सलियों और पुलिस व केंद्रीय सुरक्षाबलों के दबाव से आदिवासियों का बुरा हाल है, वो प्रताड़ित हो रहे हैं. सरकार के इस रुख के बाद पुलिस और केंद्रीय सुरक्षाबलों के जवान पसोपेश में है. उन्हें राज्य सरकार की नई रणनीति के निर्देशों का इंतजार है.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के सत्ता संभालने के बाद नक्सली फ्रंट पर भी बदलाव के आसार बढ़ गए है. पूर्ववर्ती बीजेपी सरकार की नजर में जहां नक्सलवाद, देशद्रोही और भटके हुए नौजवानों का आंदोलन है. वहीं, राज्य की नई नवेली कांग्रेस सरकार इसे सामाजिक और आर्थिक समस्या के रूप में देख रही है.

हालांकि पिछली सरकार ने भी अपने शुरुआती कार्यकाल में इसे सोशियो इकोनॉमिक प्रॉब्लम की नजरों  से देखा था लेकिन नक्सलियों की हिंसात्मक गतिविधियों को देखकर उसने इस आंदोलन को चुनी गई सरकार के खिलाफ बंदूक की नोंक पर बगावत और देशद्रोह के दायरे में लाया.

बंदूक का जवाब बंदूक से देने की रणनीति पर अमल

पुरानी सरकार ने बस्तर में विकास के खूब काम किए, और तो और आदिवासियों की उन्नति के लिए सरकारी योजनाओं को उन तक जोर-शोर से पहुंचाया. इसके बावजूद जब नक्सली हिंसा थामे नहीं थमी तो सरकार ने बंदूक का जवाब बंदूक से देने की रणनीति पर अमल शुरू कर दिया. हालांकि इस रणनीति से जान-माल का नुकसान सिर्फ नक्सलियों को ही नहीं बल्कि पुलिस और केंद्रीय सुरक्षाबलों को भी उठाना पड़ा.

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के खिलाफ कई ऑपरेशन प्लान किए गए, लेकिन अब इस इलाके में एंटी नक्सल ऑपरेशन ठप्प पड़ता नजर आ रहा है. कारण नक्सलवाद के सफाए के लेकर कांग्रेस की नई रणनीतिक सोच. सरकार का मानना है कि आदिवासी एक ओर बंदूक की नोंक पर नक्सलियों को संरक्षण दे रहे हैं, वरना सहायता नहीं देने पर नक्सली उन्हें मार रहे है , तो दूसरी ओर नक्सलियों को  संरक्षण देने पर पुलिस उन पर मामले दर्ज कर उन्हे प्रताड़ित कर रही है.  ऐसे में बस्तर की बड़ी आबादी दोनों ओर से पिस रही है. सरकार ने यह भी कहा है कि यह सामाजिक और आर्थिक समस्या है.

उधर, सरकार की इस नई सोच से  बस्तर में राजनीत‍िक गलियारों से लेकर जंगलो के भीतर के गांव कस्बो की पगडंडियों तक  एक नई बहस छिड़ गई है. बहस इस बात को लेकर हो रही है कि कही यह रणनीतिक बदलाव बस्तर के आम जनजीवन पर भारी न पड़ जाए.

जनअदालत में उनके सीने में गोली दाग दी जाएगी

दरअसल, पिछले कई वर्षों से लगातार नक्सली उन लोगों को मौत के घाट उतार रहे हैं, जो उनकी खिलाफत में जुटे हैं. यही नहीं सरकार का सहयोग करने वालो को भी नक्सली नहीं बख्शते. ऐसे में नई रणनीति कितनी कारगर होगी इसे लेकर संशय बना हुआ है. लोगों को लग रहा है कि यदि उन्होंने नक्सलियों के खिलाफ मुंह खोला तो उनकी खैर नहीं और यदि सरकार की हां की हां मिलाई तो जनअदालत में उनके सीने में गोली दाग दी जाएगी.

छत्तीसगढ़ में नई सरकार के गठन के बाद  बस्तर के मैदानी इलाको से लेकर घने जंगलो तक पुलिस और केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती पहले की तरह ही है लेकिन न  तो किसी एंटी नक्सल ऑपरेशन की सुगबुगाहट है और न ही पहले जैसे नक्सलियों और उनके सहयोगियों की धड़-पकड़ . एंटी नक्सल ऑपरेशन के चीफ डीएम अवस्थी भी अपनी मौजूदा जिम्मेदारियों के साथ पुलिस महकमे के भी डीजीपी बन गए हैं.

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नक्सलवाद को लेकर अपना नजरिया बताते हुए कहा कि आदिवासी इलाकों में उन लोगों से रायशुमारी कर इस समस्या का हल निकाला जाएगा जो दोनों ओर से प्रभावित हुए हैं. उनका मानना है कि बीजेपी सरकार ने बंदूक के सहारे इस समस्या का हल निकालने की कोशिश की  लेकिन हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया. उन्होंने कहा कि आदिवासियों से पूछा और समझा जाएगा कि इससे कैसे निपटा जाए. उन्होंने यह भी कहा कि यह सिर्फ कानून व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि मामला राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और भौगोल‍िक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है.

उधर, कोटा से विधायक कवासी लखमा ने नक्सलवाद के खात्मे को लेकर बीजेपी सरकार पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि बस्तर के अंदरूनी इलाको में सरकार नाम की कोई चीज नहीं है. यहां के आदि‍वासियों को सिर्फ छत्तीसगढ़ लिखने का अधिकार मिला है. न तो उन्हें रोजगार मिल पाया और न ही मूलभूत सुविधाएं.

रोजगार के लिए आंध्रप्रदेश और तेलंगाना पर निर्भर

इन इलाकों में सरकारी योजनाओं के कागजो में संचालित होने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि यहां के लोग इलाज कराने से लेकर सामानों की खरीदी-बिक्री और रोजगार के लिए आंध्रप्रदेश और तेलंगाना पर निर्भर है. छत्तीसगढ़ की कोई योजनाओ का यहां के लोगों को लाभ नहीं मिल पाता.

उधर, राज्य के नवनियुक्त डीजीपी डीएम अवस्थी का कहना है कि नक्सलवाद को लेकर सरकार की चिंताओं पर गहन विचार किया जा रहा है. उनके मुताबिक इस मामले जल्द फैसला लिया जाएगा और उसकी जानकारी पत्रकारों तक पहुंचाई जाएगी.

बीजेपी सरकार को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा

पंद्रह साल तक छत्तीसगढ़ की पूर्ववर्ती बीजेपी सरकार ने वर्ष 2022 तक नक्सलवाद के पूरी तरह से सफाए का लक्ष्य रखा था, लेकिन 2018 के विधान सभा चुनाव में मुख्यमंत्री रमन सिंह की नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा. अब नक्सलवाद के तकाजे पर राज्य की नई कांग्रेस सरकार कसी जा रही है लेकिन उसी पुराने फार्मूले पर जिसे पूर्ववर्ती बीजेपी सरकार ख़ारिज कर चुकी है.

फ़िलहाल सरकार के रुख से यह साफ नहीं हो रहा है कि आने वाले दिनों में बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ कोई बड़ा ऑपरेशन अंजाम तक पहुंचेगा, या फिर क्या होगा नक्सलियों का. छत्तीसगढ़ में नई सरकार की गठन के बाद से नक्सली फ़्रंट पर बदलाव स्वभाविक माना जा रहा है, लेकिन राज्य की कांग्रेस सरकार अपनी नई रणनीति को कब अमली जामा पहनाएगी, इस ओर सबकी निगाहें लगी हुई हैं.

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