Delhi Nizamuddin Markaz: क्या जान से बड़ा है धर्म ?

नई दिल्ली. देश और विश्व में कोरोना वायरस (Coronavirus) का प्रभाव दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है. मरने वालों की संख्या हर दिन बढ़ रही है. मौत के आंकड़ों ने प्रथम विश्व युद्ध और द्तीय विश्व युद्ध को भी पीछे छोड़ दिया है. 100 से ज्यादा देशों में पांव पसार चुके इस वायरस के कारण लगभग पूरे विश्व में लॉकडाउन (Lockdown) की स्थिति है. लेकिन इतने कठिन और चुनौती पूर्ण माहौल में भी मरकज जैसे कार्यक्रम बताते है कि धर्म से बड़ा कुछ नहीं हो सकता, यहां तक की आप का जीवन भी नहीं.

धर्म से बड़ा इस दुनिया में कोई नशा नहीं होता, यह हम सब भंलीभांति जानते है और यह भी जानते है कि जान हैं तो जहान है. इतना सब कुछ जानने और समझने के बाद भी इस तरह की गलतियां, हमारे पूरे समाज को मौत के कुंए में धकेल रही है. स्वास्थ मंत्रालय ने देशवासियों को सचेत किया है कि सामाजिक दूरी हमें बना के रखना होगा, अन्यथा वायरस अगर कम्यूनिटी ट्रांसमिशन (Community Transmission) का रुप ले लेगा तो, हमारे देश को इटली, अमेरिका बनने में ज्यादा समय नहीं लगेगा.

विश्व के विकसित देशों द्वारा जिस तरह से इस वायरस को संभाला गया हैं वह बहुत अच्छा तो नहीं है, लेकिन इस महामारी (जिसकी ना तो कई दवा है और ना ही इलाज) को जैसे भी संभाला है वह ठीक-ठाक है. भारत में अभी तक इस वायरस के चपेट में 1600 से ज्यादा लोग आ गए है. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि निजामुद्दीन मरकज में शामिल लोगों में अभी तक करीब 130 से ज्यादा लोग संक्रमित पाएं गए हैं, जिससे देश में संक्रमित लोगों की संख्या को 1600 के पार पहुंचा दिया.

क्या होता है मरकज

देश में सोशल मीडिया पर एक सवाल पूछा जा रहा है कि मरकज (Markaz) क्या होता है? मरकज का मतलब – वह स्थान जहां जलसा आयोजित किया जाता है. दूसरी भाषा में कहें तो सेंटर. दरअसल में निजामुद्दीन (जो मरकज का सबसे बड़ा स्थान है) वहां पर तब्लीगी जमात संगठन ने जलसा आयोजित किया था. ज्यादातर तीन तक चलने वाले इस जलसे में धर्म के उत्थान के बारे में बात की जाती हैं. इस कार्यक्रम में हजारों की संख्या में लोगो शामिल होते है और धर्म के अच्छाईयों और बुराईयों के भेद को दूर करते है. यह वैसे ही जैसे की किसी दूसरे धर्म में कोई धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है, जहां हजारों और लाखों की संख्या में लोग शामिल होते है और अपने धर्म के बारे में बात करते है.

क्या यहीं है लॉकडाउन

कहने को तो देशभर में लॉकडाउन हैं, गरीब लोग जो भूख से मरने के डर से अपने घर कई मील पैदल जा रहे है उन्हें पुलिस पीट रही है, उनको क्वाइंटाइन किया जा रहा, उनको सामुहिक तौर पर बैठाकर पानी का छिड़काव किया जा रहा है. ( कई लोग तो उस छिड़काव में कीटनाशक होने की बात कर रहे है, हालांकि हम इस को सत्यापित नहीं कर सकते, इसलिए इस पर कुछ भी कहना गलत होगा). इतनी सख्ती होने के बावजूद भी देश की राजधानी में हजारों लोग एक जलसे में शामिल हुए और प्रशासन को खबर भी नहीं. इसका जवाब तो इतना आसान नहीं है कि सरकार, एंजेसियां इस पर क्यों नही कोई रोक लगा पाई, और सबसे महत्वपूर्ण सवाल निर्दोषों को मारने वाली पुलिस को कैसे इसके बारे में जानकारी नहीं मिली . प्रश्न तो बहुत है लेकिन हमारे मीडिया को एक बहुत बड़ा मुद्दा इस जलसे के बाद मिल गया है. कोरोना वायरस, पाकिस्तान वायरस, चीनी वायरस आदि मुद्दो से ऊब चुके हमारी मीडिया को मजहब वायरस का मुद्दा मिल गया है. एक हफ्ते के इस विषय में चैनल और समाचार पत्र क्या दिखाएंगे, यह तो अभी से देखने पर ही पता चलेगा, लेकिन इतना तो जरुर है कि हिंदू-मुस्लिम करने वाले पत्रकार अब कोरोना वायरस के नाम पर हिंदू-मुस्लिम करेंगे.

महामारी को हलके में लेती सरकार

यह धार्मिक आयोजन को गलत था ही और सरकार ने आयोजकों पर एफआईआर दर्ज करने के आदेश देते हुए अपनी कारवाई को शुरु कर दिया है लेकिन सवाल तो यह हैं कि कैसे सरकार वैश्विक महामारी को इतने हलके में ले सकती है. जनता से सहयोग की उम्मीद लगाएं हमारे प्रधानमंत्री को देश की जनता ने तो निराश अभी तक नहीं किया हैं लेकिन सरकार की तैयारियों ने जनता का जरुर निराश किया है. चाहें बात मजूदरों के घर वापसी की करें या टेस्टिंग में सुस्ती की, सरकार हर मुद्दे पर अभी तक जनता की उम्मीदों पर ख़री नहीं उतरी है.

सरकारों की सुस्ती की बात करे तो मध्यप्रदेश का उदाहरण हमारे सामने है जहां पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की प्रेस कॉन्फेंस में शामिल एक पत्रकार कोरोना वायरस से पॉजिटिव पाए गए थे, जिसके बाद सरकार ने लोगों को खुद क्वाइंटाइन करने के लिए एक विज्ञप्ति जारी कर खानापूर्ति कर दिया. देश में यह तो सिर्फ एक उदाहरण है, ऐसे बहुत से केस हमारे सामने हैं जहां सरकार की लापरहवाही साफ दिखती है. वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार ने बुधवार को एक फेसबुक पोस्ट पर जानकारी देते हुए बताया कि आने वाले समय में देश को सबसे ज्यादा जरुरत आईसीयू और वेटिलेंटर की होगी. उन्होंने इस पोस्ट में खासकर जिक्र बिहार का किया है, जिसमें उन्होंने सरकार के स्वास्थ मंत्री द्वारा 2018 में सदन में दिए गए बयान का जिक्र करते हुए कहा कि प्रदेश के सिर्फ 20 जिलों में आईसीयू हैं बाकि के जिलों में अभी यह व्यवस्था नहीं है. इतनी लचर स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकारी लापहरवाही से भारत कबतक और कैसे कोरोना वायरस जैसे घातक महामारी का मुकाबला करेंगा, यह हमें देखना और सोचना होगा.

हिंदू-मुस्लिम होता कोरोना वायरस

कोरोना वायरस ने निजामुद्दीन जलसे के बाद से हिंदू- मुस्लिम का रुप ले लिया है. इस मामले में एक समुदाय की गलती तो साफ नजर आती है, लेकिन हमें यह ध्यान देना चाहिए कि, यह आयोजन तब्लीगी जमात ने किया था, इसलिए इस संगठन पर आलोचना करना सहीं है लेकिन इसके बहाने पूरे समुदाय को निशाना बनाना कहा तक जायज है. सोशल मीडिया ने लोगों को बोलने की आजादी तो दी, लेकिन फेक न्यूज फैलाने का सबसे बड़ा माध्यम भी यही मीडिया बना. ट्वीटर की दुनिया में आईटी सेल ने जो जहर फैलाने का काम शुरु किया, वह धीरे-धीरे मुख्यधारा की मीडिया में आ गया. जिसके बाद से हिंदू-मुस्लिम शुरु हो गया.

हमें ध्यान देना चाहिए कोई भी बीमारी किसी का मजहब पूछ कर या बता कर नहीं आती है, इसलिए सावधानी के साथ रहें और कोरोना वायरस महामारी का मुकाबला करें.

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