भारतीय मीडिया भी अब कांग्रेस और बीजेपी की तरह रोजगार और मदरसों पर कर रही बहस

नई दिल्ली। भारतीय मीडिया को देश में चौथा स्तंभ माना जाता है, क्यों की यह अन्य तीनों स्तंंभो से अलग अपना काम करता है। यह जनता और मशीनरी के बीच माध्यम बन कर काम करता है।

मीडिया की मौजूदा हालत तो अब ऐसे हो गए है जैसे यह राजनीतिक पार्टियां के मुखौटे बन कर आने वाले चुनावो के लिए मुद्दे तैयार करना है। कोई मीडिया की दुकान रोजगार, जीएसटी, राफेल डील, मोब लींचिंग और नोटेबंदी के फायदे, तो मीडिया की दूसरे तरफ की दुकान मदरसे में राष्ट्रगान, असम में एनआरसी के बहाने मुस्लिमों को निशाना बनाना, गौरक्षो की तारीफ जैसे कहीं मुद्दे।

इन मीडिया दुकानें कुछ ऐसी भी है जो राजनीति से हटकर राम रहीम, जगल की बाते , तो कोई नेताओं का सम्मेलन करवाता है। ये दुकानें समय के हिसाब से बदलती रहती है, शादी के समय में ये दूल्हे और दुल्हन के कपड़े रखना शुरू कर देते है, फिर गर्मी के सीजन में आइसक्रीम की दुकान, और ठंड में चाय (इसे मोदी जी वाली से मत जोड़िए).

मीडिया मुख्य तौर पर दोनो राजनीतिक पार्टियों के तरह  काम करती है, एक तरफ बीजेपी और दूसरे तरफ कांग्रेस. कोई कोई मीडिया एनसीपी, बीएसपी और सीपीएम जैसे पार्टियों के लिए भी कुछ दिनों के लिए काम करती है जब तक कि यह हार राज्य में अपने राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर पहचान बनाए रखते है।

मीडिया और राजनीति का यह जोड़ी जानना चाहते है तो सिर्फ दो चैनलों को देख लीजिए, वो भी सिर्फ दो मिनट ।के लिए। आप समझ जाएंगे कि मै किन चैनलों की बात कर रहा हूं।

चैनल, अखबार और पोर्टल आज के समय में अपनी बात ऐसे रखते है जैसे सिर्फ इन्हे ही बोलने कि आजादी मिली है। लेकिन सच तो यह है कि जो बोलने की आजादी मीडिया को मिली है वहीं आम जनता को भी, तो फिर ये मीडिया कैसे अकेले ही बोलने कि आजादी को जनता से छीनना चाहते है?

यह मीडिया आजादी वैसे ही छीनना चाहता है जैसा राजनीतिक पार्टिया लोगो के साथ करती है। सत्ता पक्ष के बारे में बोलने पर आप सही है, अगर गलत बोला तो आप देश द्रोही, हिन्दू विरोधी। वहीं अगर विपक्ष के बारे में आप सही बोलते है तो सही है अगर गलत बोला तो आप भक्त हो गए है जैसे और कई शब्द सुनने पड़ते है।

अपने आप को सबसे अलग बोल कर चौथे स्तंभ बने इस मीडिया को अलग बोलने का अधिकार नहीं होना चाहिए, क्यों की यह तो राजनीतिक पार्टियों का जनता के बीच सिर्फ मुखौटा है। कोई साफ राजनीति करने का बोल कर जनता से जुड़े मुद्दे उठाने की बात करता है तो कोई जाति धर्म के बारे में बोल कर राजनीति करना चाहता है। वैसे ही मीडिया में कोई आम जनता से जुड़़े मुद्दे उठाने का कहता है, तो कोई पैरासूट से आए मुद्दे उठाकर टीवी पर न्यूज दिखाने का कोटा पूरा करता है। जैसे कि राजनीति के लोग सरकार में आने के बाद करते है।

अंत में यही की जो सोचता है कि पत्रकारिता समाज और राजनीति को बदलने के लिए पढ़ रहा हूं, तो समझ लीजिए कि एक दिन आप या तो इस पार्टी के रह जाएंगे या उस पार्टी के. क्यों की यह समाज और राजनीति आप को बदल देगी।

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