शहर गए थे मजबूरी में, अब वहीं से मजबूर हो कर लौट रहे

Migrant workers migration
कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन के समय पूरे देश ने मजदूरों के पलायन को देखा. आम नागरिक से लेकर खास नागरिक तक सभी को मजदूरों के पलायन का फोटो विचलित कर रहा हैं. इन सब के बीच भी सरकार इन चित्रों को नजरअंदाज कर रही है.

बेतहाशा दर्द झेलते हुए पैदल चल रहे मजदूरों की दशा देखी नहीं जा रही और न ही अब उनसे बात करने की हिम्मत होती है। हालात ये हैं कि बस, ट्रेन से भी आने वाले मजदूर भाइयों के चेहरों को देखकर ही उनकी बेबसी, मजबूरी व परेशानी नज़र आ जाती है. बुझे हुए चेहरे कह रहे हैं कि मजबूरी में गये थे और मजबूरी ही लौटा लाई.

भविष्य की तलाश में गांव, देहात से कमाने गये थे कि किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े और कोरोना की मार( सरकार की मार तो है ही) ने फिर उसी छोर पर लाकर खड़ा कर दिया, जहां उनको भविष्य ही नहीं दिखता.

लोग भले यह कह रहे हैं कि वो अब लौटकर नहीं जायेंगे, लेकिन काम शुरू होते ही फिर वो वहीं भागेंगे. गांव का जीवन बहुत कठिन है, ये यही मजदूर भाई बता सकते हैं जो भेड़ों की तरह जनरल डिब्बे में हजारों किलोमीटर की यात्रा करते हैं और पहली बार कुछ को सोशल डिस्टेंसिंग के साथ भले नहीं पर फिर भी आराम से सीट पर बैठकर यात्रा करने को मिला.

सरकार आज इस आपदा को अवसर बनाते हुए इनके अधिकारों को खत्म कर रही है. मनरेगा से कितनों को काम मिलेगा पता नहीं, राशन भी अभी तक उन्हें ही मिल रहा है जो पहले से पात्र हैं.

सर पर गठरी लादे इन प्रवासी मजदूरों को देखकर ही अंदाज होता है जैसा कि एक भूमिहीन मजदूर भाई ने बताया कि बचत भले न हो पर परिवार का पालन-पोषण हो जाता है. पालन- पोषण मतलब पेट पल जाता है, तन पर कपड़े और पैरों में चप्पल नसीब हो जाती है.

इनके हालात देखकर कि कैसे इनके पास एक बैग तक नहीं है, बोरी, चद्दर में सामान लपेटे ये मेहनतकश। इससे पता चलता है कि शोषणकारी व्यवस्था द्वारा इन्हें बदनसीब बना दिया गया है.

ये अच्छी जिंदगी की तलाश में नहीं बल्कि सिर्फ जीने की तलाश में बाहर निकलते हैं. सरकार बड़ी रकम की घोषणा करते हुए इनका जिक्र करती है और हर बार इनके हिस्से आखिरी का शून्य आता है.

PM Cares fund में मिले 3100 करोड़, पलायन कर रहे मजदूरों पर खर्च होगें 1000 करोड़

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *